सन्देश कुमार शर्मा
बरसो तो सही !
रुई जैसे बादलों को
जो यहाँ बरसते हैं अक्सर
देखता हूँ जब अलसुबह
पहाड़ों की गोद में
बेफिक्री से दुबककर सोते हुए
तब बरबस
मेरा ध्यान भटक जाता है
थार में
जहां पथरा गई है आँखें
बारिश के लिए
हाथ जोड़कर कहता हूँ इनसे
बरसो यहाँ ख़ुशी से
पर एक बार मिल तो आओ
इससे पहले कि
थार का अकाल निगल जाए
उन्हें,
बरसो एक बार कि
फूटे नई कोंपले
सूखते जा रहे ठूंठों में,
जान आ जाए
मृत प्राय मवेशियों में
देखो कई बार
यहाँ तुमसे कोफ़्त हो जाती है
बार-बार बरसने पर
इसीलिए एक बार बरसकर देखो तो
थार की तपती जमीन पर
वहां स्वागत होगा तुम्हारा
ख़ुशी के आंसूओं से
जो एकमेक हो जाएंगे
तुम्हारे पानी से
देखो तो सही ,
एक बार वहां
बरसो तो सही !
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